000 04380nam a22002177a 4500
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040 _aRCL
082 _aH3091 T61S
100 _aTiwari, Ajay
245 _aSahitya Ki Samjh Aur Aalochana
_c/Ajay Tiwari
260 _aNew Delhi:
_bAnanya Prakashan,
_c2017.
300 _a192p. ; 21cm.
520 _aइसमें संदेह नहीं कि 19 वीं सदी में ‘मशीनों’ के इस विनाशकारी प्रभाव को गाँधी ने ही नहीं, मार्क्स और एंगेल्स ने भी देखा था । लेकिन वे इस विनाश का श्रेय मशीन के स्वामियों कोµपूँजीवादी उत्पादन सम्बंधों को देते थे । पूँजीवादी विकास ने एक तरफ किसान को तबाह किया, दूसरी तरफ पारम्परिक शिल्पियों को । इस तरह, कारखानों के लिए श्रमिक सर्वहारा की सुलभता निश्चित की । उन्होंने मशीन का उपयोग श्रम को परिष्कृत, पुरस्कृत आौर विकसित करने के लिए नहीं किया, उत्पादन और मुनाफा बढ़ाने के लिए किया । मार्क्स और गाँधी में समानता यह है कि आधुनिक पूँजीवादी विकास की आलोचना दोनों करते हैं । मार्क्स 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में पश्चिमी समाज के भीतर से कुछ–कुछ आत्मालोचना के रूप में और गाँधी 20 वीं सदी के पूर्वार्ध में पराधीन पूरब की ओर से, अतीत की भव्य विरासत का विश्वास लेकर । दोनों उस व्यवस्था का विकल्प खोजते हैं । दोनों की चिन्ता का विषय वंचित शोषित मनुष्य है । गाँधी की प्रेरणा का स्रोत मार्क्स नहीं, उनके समकालीन जॉन रस्किन थे । बरनवाल जी ने लिखा है, ‘‘मार्क्स जहाँ पूँजीवाद को उखाड़ फेंकना चाहते थे, वहीं रस्किन का उद्देश्य था उसे मानवीय बनाना ।’’(पृ–54) पूँजीवाद मानवीय बन सकता है या नहीं, यह अलग विचार का विषय है लेकिन वह सामंतवाद की तरह निजी स्वामित्च की व्यवस्था है । मार्क्स इस निजी स्वामित्व का उन्मूलन करना चाहते थे । लेकिन गाँधी ‘सम्पत्ति पर निजी अधिकार बरकरार रखने के पक्षधर थे’ । वे उस अधिकार की समस्याओं से परिचित थे इसलिए सम्पत्ति में ‘वंचित वर्ग की भागीदारी के लिए सतत चिंतित’ थे । इसके लिए उन्होंने ‘ट्रस्टीशिप’ का सिद्धांत अपनाया, जो ‘मार्क्सवाद का एक हद तक उनका विनम्र जवाब था ।’ (पृ– 307–8
546 _aHindi
650 _acriticism
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650 _aLiterature criticism
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