000 04671nam a22002057a 4500
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020 _a9789348409898
040 _aRCL
082 _aH308624 K18D
100 _aKajal , Ajmer Singh
_930650
245 _aDalit Sahitya Aur Manavadhikar
_c/Ajmer Singh Kajal
260 _aNew Delhi:
_bNayee Kitab Prakashan,
_c2025.
300 _a182p. ; 22cm.
520 _aभारतीय दलित साहित्य ने भारतीय साहित्य का कई स्तरों पर विस्तार और लोकतंत्रीकरण किया है। संवेदना के स्तर पर उसने जिन प्रश्नों को उठाया है वे लोकतंत्र, गणतंत्र और देश को मजबूत करने और उसे राष्ट्र बनाने के प्रश्न हैं। वर्ण-धर्म और कास्ट हिन्दू ढाँचा लोकतंत्र और गणतंत्र विरोधी है जिसके भीतर जातीय वर्चस्व एक निरंतर प्रक्रिया है यही सत्ता, समृद्धि और सम्मान निर्धारित करती है। राजनीति जिस लोकतंत्र से चलती है, सामाजिक ढाँचा उसी लोकतंत्र का विरोधी है। जिस समाज या मुल्क में समता, स्वतंत्रता, मैत्री, प्रतिनिधित्व और करुणा के आधार जातीय वर्चस्व से निर्धारित होते हों, वह समाज या मुल्क अपने साथी नागरिकों के प्रति भावनात्मक स्तर पर जुड़ने को बजाय तनाव या अंतर्विरोधों से भरा रहता है। दलित साहित्य भारतीय समाज के इसी तनाव और अंतर्विरोध को गंभीरता से चित्रित करते हुए शोषण मुक्ति, मनुष्य मुक्ति, बंधुता-बौद्धिकता और नागरिक पहचान पर बल देते हुए सवैधानिक ढाँचे के भीतर सामाजिक-सांस्कृतिक भेदभाव से लड़ने वाले नये मनुष्य की तलाश करता है। यानी दलित साहित्य का संघर्ष मनुष्य हितेषी और मानवाधिकारों का पक्षधर है। यह पुस्तक भारतीय दलित साहित्य के परिप्रेक्ष्य में मानवाधिकार जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न को कविता, कहानी, उपन्यास, आत्मकथा जैसी विधाओं की आलोचना के जरिए उठाकर सामाजिकों में मानवीय गरिमा भरने का आह्वान करती है। साहित्य पाठक को अन्याय और शोषण की खिलाफत में खड़ा करके, सामाजिक संबंधों में मौजूद जडताओं को मानवीय बनाने हेतु फेलो सिटिज़न के प्रति संवेदना की निर्मिती करता है। एफ्रो-अमेरिकी साहित्य और हिंदी दलित साहित्य में उभरे प्रतिरोध को भी यहाँ विवेचित किया गया है। अतः यह पुस्तक साहित्य की विभिन्न विधाओं में मानवाधिकारों की पहचान, विवेचना और मूल्य निर्धारण करने का गंभीर प्रयास है।
546 _aHindi
650 _aDalit Sahitya
_929062
942 _cBK
999 _c47909
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