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020 _a978-8131614471
040 _aRCL
082 _a305.8 D53A.1
100 _aDewan, Hriday Kant
_930656
245 _aAsamanta Reader-1
_bAsamantaayein - Saiddhantik Drishtiyan
_c/ Hriday Kant Dewan, Sanjay Lodha, Arun Chaturvedi, Manoj Rajguru
260 _aJaipur:
_bRawat Publication,
_c2025.
300 _axii, 209p. ; 23cm.
500 _aअसमानताएँ: सैद्धान्तिक दृष्टियाँ सम्पादन : हृदय कान्त दीवान | संजय लोढ़ा | अरुण चतुर्वेदी | मनोज राजगुरु
505 0 _aखण्ड - 1 सैद्धान्तिक विवेचनाएं 1 असमानता: प्राकृतिक बनाम सामाजिक आन्द्रे बेते 2 सामाजिक पूँजी की अवधारणा जेम्स फर 3 अश्वेत वैश्विक दर्शन चार्ल्स सी. बर्हेरेन 4 रॉल्स का बदलता चिन्तन नलिनी राजन 5 असमानता का बदलता स्वरूप हृदय कान्त दीवान, संजय लोढ़ा एवं मनोज राजगुरु 6 नारीवाद, पहचान और पहचान की राजनीति सुजैन हैकमैन 7 लैंगिक असमानता के अनेक पहलू अमर्त्य सेन 8 गैर-बराबरी: क्षमता, अवसर व दस्तूर हृदय कान्त दीवान 9 असमानता बनाम योग्यतावाद मनोज राजगुरु खण्ड - 2 भारतीय दृष्टियां 10 असमानता के दार्शनिक आधार: भारतीय चिन्तन दृष्टि सुधा चौधरी 11 सामाजिक न्याय का अर्थ वी. आर. कृष्ण अय्यर 12 व्यक्ति, समाज और न्याय ए. अप्पादुराय 13 जनतंत्र, स्वाधीनता और समता ए. अप्पादुराय 14 अवमानना के आयाम गोपाल गुरु 15 अस्मिताओं का सहअस्तित्व घनश्याम शाह 16 दलितों के अभिजन विजय बहादुर सिंह
520 _aआज के संदर्भ में असमानता एक अहम मुद्दे के रूप में उभरी है। राष्ट्रों, क्षेत्रों, कौमों और व्यक्तियों के बीच असमानताओं के बदलते संदर्भ पर न सिर्फ विचार हो रहा है वरन् कई प्रकार के तथ्य आधारित शोध भी विमर्श को समृद्ध कर रहे हैं। यह संकलन, असमानता पर विभिन्न महत्त्वपूर्ण वैश्विक सैद्धांतिक दृष्टियों को प्रस्तुत करता है। असमानता की सैद्धान्तिक विवेचनाओं से जुड़े नौ आलेख प्राकृतिक बनाम सामाजिक असमानता के परिप्रेक्ष्यों के बीच के संघर्ष तथा इसके व्यक्तिवाद व सामूहिकता व ‘सामाजिक पूँजी की अवधारणा’ से संबंध और श्वेत तथा अश्वेत के बीच के भेदभाव का विश्लेषण करते हैं। सैद्धांतिक रूप से असमानता को उदारवाद और सामाजिक न्याय के साथ रखकर देखने पर धार्मिक स्वतंत्रता, विशिष्टता के सिद्धान्त, लोक-बुद्धि और विवेक जैसी संकल्पनाओं पर विचार आवश्यक हो जाता है। बाकि के सात लेख असमानता की भारतीय दृष्टि व उसकी भारतीय परिस्थिति को समझने का प्रयास है। लेख दूसरी दुनिया अर्थात् परलोक के विचार के असमानता के साथ अंतर्संबंध और ‘सामाजिक न्याय’ के अर्थ में गरीब और अमीर के बीच की खाई तथा उनके बीच के व्यवहार पर लक्षित हैं। संकलन यह बात सामने रखता है कि आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तन के तहत ‘व्यक्ति, समाज और न्याय’ की सम्बद्धता को परखना महत्त्वपूर्ण है व इस पर व्यापक मंथन व चिंतन की आवश्यकता है। आधुनिक प्रजातांत्रिक व्यवस्थाओं की एक उदारवादी संकल्पना असमानता को खत्म कर समानता स्थापित करना है। ‘जीवन में समानता’ एक ऐसा वैश्विक सामाजिक स्वतः सिद्ध आदर्श, मूल्य एवं लक्ष्य है, जिसके प्रति सभी समाजों में प्रतिबद्धता दिखती है। समानता तक पहुंचने के अन्तर्विरोधी आयाम भारत के इस यथार्थ में प्रकट दिखते हैं कि राजनीतिक घोषणाओं, संवैधानिक प्रावधानों, व अकादमिक विमर्शों के बावजूद, सामाजिक यथार्थ में असमानता खत्म करने को मूर्त रूप देने की सम्भावनाएँ क्षीण हो रही हैं। यह संकलन इन्हीं सभी विमर्शों को प्रस्तुत करता है।
546 _aHindi
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700 _aLodha, Sanjay
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700 _aChaturvedi, Arun
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