000 02236nam a22002057a 4500
003 RNL
005 20260316090334.0
008 260316b |||||||| |||| 00| 0 eng d
020 _a9788119141340
040 _aRCL
082 _aH3109 P23SN
100 _aNagendra
245 _aSumitranandan Pant
_c/Nagendra
260 _aNew Delhi:
_bAnanya Prakashan,
_c2025.
300 _a160p. ; 23cm.
520 _aइस पुस्तक में संकलित विषयों के कुछ अंशों को मैं श्री नगेन्द्र जी के मुख से सुन चुका हूँ । उन्होंने पर्याप्त अध्ययन एवं मनन के पश्चात् अत्यंत सहृदयता के साथ मेरी रचनाओं के गुण–दोषों का विवेचन किया है । अपने प्रयास में उन्हें कहाँ तक सफलता मिली है, इसका निर्णय पाठक ही कर सकते हैं । मुझे इतना ही कहना है कि उन्होंने मेरे साथ काफी सहानुभूति रखी है । उनके दृष्टिकोण से अपनी रचनाओं के गुण–दोषों को परखने का अवसर पाकर मुझे आनंद मिला और अपनी कमज़ोरियों को समझने में सहायता मिली, जिसके लिए मैं उनका कृतज्ञ हूँ । श्री नगेन्द्र जी स्वयं भी कवि हैं । अपने कवि–हृदय के माधुर्य से मेरे कवि को और भी सुंदर बनाकर वे पाठकों के सामने प्रस्तुत कर सके हैं, इसमें मुझे संदेह नहीं । —सुमित्रानंदन पंत
546 _aHindi
650 _aAlochana
_929986
942 _cBK
999 _c47933
_d47933