| 000 | 02686nam a22002057a 4500 | ||
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| 003 | RNL | ||
| 005 | 20260316093305.0 | ||
| 008 | 260316b |||||||| |||| 00| 0 eng d | ||
| 020 | _a9789395226189 | ||
| 040 | _aRCL | ||
| 082 | _aH3109 M58S | ||
| 100 |
_aMeena, Rakesh Kumar _930695 |
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| 245 |
_aSurdas ka Kavya : _b(Gramey Aur Nagar Sanskriti Ka Dwandh) _c/Rakesh Kumar Meena |
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| 260 |
_aNew Delhi: _bAdwait Prakashan, _c2025. |
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| 300 | _a95p. ; 21cm. | ||
| 520 | _aआज भारतीय समाज एक विकट संकट से गुजर रहा है। यह संकट जितना सामाजिक और राजनीतिक है उससे अधिक सांस्कृतिक है, क्योंकि आज के तकनीकी एवं भौतिकवादी युग में सूर काव्य की क्या प्रासंगिकता रह गई है? आज भूमण्डलीकरण और बाजारवादी दुनिया में जहां भारतीय जीवन विदेशी संस्कृति को आत्मसात कर रहा है। ऐसे में सूर की कविता की क्या उपयोगिता है? सूर के अनुसार गाँव के जीवन और व्यवहार में सहजता, ईमानदारी, सच्चाई है, जबकि शहर अनैतिकता, छल-प्रपंच और चालाकी का गढ़ है। आज भी शहर सत्ता और शक्ति के केन्द्र के साथ-साथ, अत्याचार और शोषण का गढ़ छल और प्रपंच का प्रतीक है, वैसे सही भी है कि शहर जितना हमें देता है उससे कहीं अधिक हमसे छीन लेता है। सूरदास की कविता में नवीन तत्त्वों की खोज प्रकारान्तर से आधुनिक संदर्भों में उसकी प्रासंगिकता की खोज है, और इस खोज के लिए हमारा प्रयास निरंतर रहना चाहिए, समय के जिस मोड़ पर आज हमारी सभ्यता तथा संस्कृति पहुंच चुकी है | ||
| 546 | _aHindi | ||
| 650 |
_a Kavita _927387 |
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| 942 | _cBK | ||
| 999 |
_c47937 _d47937 |
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