Utpeediton Ke Vimarsh (Record no. 47815)
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| fixed length control field | 05175nam a22002177a 4500 |
| 003 - CONTROL NUMBER IDENTIFIER | |
| control field | RNL |
| 005 - DATE AND TIME OF LATEST TRANSACTION | |
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| 008 - FIXED-LENGTH DATA ELEMENTS--GENERAL INFORMATION | |
| fixed length control field | 260219b |||||||| |||| 00| 0 eng d |
| 020 ## - INTERNATIONAL STANDARD BOOK NUMBER | |
| ISBN | 978-9360862619 |
| 040 ## - CATALOGING SOURCE | |
| Original cataloging agency | RCL |
| 082 ## - DEWEY DECIMAL CLASSIFICATION NUMBER | |
| Classification number | H308624 T17U |
| 100 ## - MAIN ENTRY--PERSONAL NAME | |
| Personal name | Talwar, Vir Bharat |
| 245 ## - TITLE STATEMENT | |
| Title | Utpeediton Ke Vimarsh |
| Statement of responsibility, etc | /Vir Bharat Talwar |
| 260 ## - PUBLICATION, DISTRIBUTION, ETC. | |
| Place of publication | New Delhi: |
| Name of publisher | Rajkamal Prakashan Pvt. Ltd, |
| Year of publication | 2025. |
| 300 ## - PHYSICAL DESCRIPTION | |
| Number of Pages | 279p. ; 23cm. |
| 500 ## - GENERAL NOTE | |
| General note | उत्पीड़ितों के विमर्श |
| 520 ## - SUMMARY, ETC. | |
| Summary, etc | आदिवासी समाज को ज्यादातर रोमांटिक दृष्टि से देखा गया है। सिर्फ उनके हितैषी गैर-आदिवासी कार्यकर्ताओं और विद्वानों द्वारा ही नहीं, बल्कि खुद कुछ आदिवासियों द्वारा भी। कुछ आदिवासी साहित्यकार अपने विमर्श में आदिवासी समाज का जैसा सुन्दर, सर्वांगपूर्ण चित्र खींचते हैं, उस चित्र का खुद उन्हीं के द्वारा लिखी हुई कहानियों और उपन्यास में व्यक्त यथार्थ से कोई मेल नहीं बैठता; दोनों के बीच दूरी और अन्तर्विरोध दिखाई देता है। विमर्श में यह दावा किया जाता है कि दुनिया की सारी समस्याओं का हल आदिवासी समाज दर्शन से ही निकलेगा जबकि आदिवासी खुद कई समस्याओं से घिरे हुए हैं और अपनी ही समस्याओं को हल नहीं कर पा रहे हैं। ऐसा आदिवासी-विमर्श भी एक अतिवाद ही है। जैसे एक अतिवाद यह है कि हमें आदिवासियों का उद्धार करना है, वैसे ही दूसरा अतिवाद यह है कि आदिवासी से ही सबका उद्धार होगा। आदिवासी दर्शन के प्रवक्ता आदिवासी समाज की उन वास्तविकताओं को नहीं देखते, उन कमजोरियों को नहीं देखते जिनके खिलाफ लड़कर आदिवासियों को सचेत करने की जरूरत है। उलटे कभी-कभी ये कमियाँ भी उनकी नजर में गौरवपूर्ण बन जाती हैं। यह एक तरह की मनोवैज्ञानिक क्षतिपूर्ति है। उदाहरण के लिए कुछ लोग कहते हैं कि श्रम आदिवासी जीवन का बहुत बड़ा मूल्य है। यह बात दलितों के प्रसंग में भी कुछ विद्वानों ने कही है। सचाई यह है कि आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से जितने भी कमजोर और पिछड़े हुए समाज हैं—जिनमें आदिवासी और दलित भारत में मुख्य हैं—उन सबमें श्रम करने का लगभग सारा बोझ स्त्रियों के सिर पर डाल दिया गया। श्रम उनके पुरुषों को भी करना पड़ता है, लेकिन पुरुषों के जिम्मे सिर्फ कुछ एक महत्त्वपूर्ण काम होते हैं तथा उनका बहुत-सा समय सोने, तमाखू पीने, दारू पीने, जुआ खेलने या स्थानीय राजनीति करने जैसे कामों में खर्च होता है। चाहे बर्मा की सीमा पर बसे मिजो आदिवासियों का समाज हो अथवा तिब्बत की सीमा पर बसे भोटियों का समाज हो—सभी आदिवासी समाजों में स्त्रियों को ज्यादा-से-ज्यादा काम करना पड़ता है। —इसी पुस्तक से |
| 546 ## - LANGUAGE NOTE | |
| Language note | Hindi |
| 650 ## - SUBJECT ADDED ENTRY--TOPICAL TERM | |
| Topical Term | आदिवासी समाज |
| 942 ## - ADDED ENTRY ELEMENTS (KOHA) | |
| Koha item type | Books |
| Full call number | Accession Number | Lost status | Damaged status | Price effective from | Koha item type | Not for loan | Collection code | Withdrawn status | Home library | Current library | Shelving location | Date acquired | Cost, normal purchase price |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| H308624 T17U | 65512 | 02/19/2026 | Books | Hindi Books | RCL | RCL | General Stacks | 12/15/2025 | 995.00 |


