/ 3



Samaj Sahitya aur Aalochana (Record no. 47928)

MARC details
000 -LEADER
fixed length control field 04528nam a22002177a 4500
003 - CONTROL NUMBER IDENTIFIER
control field RNL
005 - DATE AND TIME OF LATEST TRANSACTION
control field 20260316065202.0
008 - FIXED-LENGTH DATA ELEMENTS--GENERAL INFORMATION
fixed length control field 260316b |||||||| |||| 00| 0 eng d
020 ## - INTERNATIONAL STANDARD BOOK NUMBER
ISBN 9789392998638
040 ## - CATALOGING SOURCE
Original cataloging agency RCL
082 ## - DEWEY DECIMAL CLASSIFICATION NUMBER
Classification number H3091 T61S
100 ## - MAIN ENTRY--PERSONAL NAME
Personal name Tiwari, Ajay
245 ## - TITLE STATEMENT
Title Samaj Sahitya aur Aalochana
Statement of responsibility, etc /Ajay Tiwari
260 ## - PUBLICATION, DISTRIBUTION, ETC.
Place of publication New Delhi:
Name of publisher Nayee Kitab Prakashan,,
Year of publication 2024.
300 ## - PHYSICAL DESCRIPTION
Number of Pages 184p. ;22cm.
500 ## - GENERAL NOTE
General note Society Literature and Criticism (समाज साहित्य और आलोचना )
520 ## - SUMMARY, ETC.
Summary, etc साहित्य में जब आलोचना का ह्रास या अवमूल्यन होता है तब रचनाशीलता यथास्थितिवाद की ओर बढ़ती है । जब समाज में आलोचना–बुद्धि का क्षरण या बहिष्कार होता है तब मनुष्यता गतिरुद्ध होकर बर्बरता की ओर बढ़ती है । दोनों स्थितियों में सामाजिक या राजनीतिक सत्ता निरंकुश होती है । यह जानी–मानी बात है कि मनुष्य की भौतिक उपलब्धियों में श्रम और कला, आत्मिक उपलब्धियों में भाषा और दर्शन तथा बौद्धिक उपलब्धियों में रागात्मक संवेदना और आलोचनात्मक विवेक सबसे मूल्यवान हैं । इन सबको मनुष्य की सहजात प्रवृत्तियाँ कहा जाता है । इन सहजात प्रवृत्तियों से मनुष्य की सहजता का घनिष्ठ सम्बन्ध है । इनके साथ ही मनुष्य के सामाजिक सम्बन्ध होते हैं । ये सम्बन्ध मनुष्य की दोहरी गतिविधि का परिणाम हैं । एक ओर काम, क्षुधा, क्रोध जैसी सहज आवेगमय वृत्तियाँ हैं जो सभी प्राणियों में हैं, मनुष्य में वे परिष्कृत रूप में हैं । दूसरी ओर संयम, मर्यादा, सहजीवन आदि नैतिक प्रवृत्तियाँ हैं जो मनुष्य की अपनी हैं । दोनों में संतुलन भी रहता है और टकराव भी । जहाँ संतुलन रहता है, वहाँ अनुशासन की ये शक्तियाँ सहज वृत्तियों के सामंजस्य में होती हैं । ऐसा अक्सर समाज की उन्नतिशील अवस्था में देखा जाता है । लेकिन प्राय: मनुष्य की सहज वृत्तियाँ आवेगमूलक होती हैं और संयम–अनुशासन की प्रवृत्तियाँ विवेकमूलक । दोनों में संतुलन लाने के लिए मनुष्य की आंतरिक शक्तियों से अधिक बाह्य संस्थाएँ महत्वपूर्ण होती हैं । जैसे परिवार, सामाजिक सम्बन्ध, राज्य के नियम । मनुष्य नैसर्गिक सहज वृत्तियों के साथ–साथ इन अर्जित सजग प्रवृत्तियों को स्वेच्छा से तभी अपना सकता है जब उसे अपनी सीमाओं और कर्तव्यों का तथा समाज की आवश्यकताओं और भूमिकाओं का उचित विवेक हो । ---भूमिका से
546 ## - LANGUAGE NOTE
Language note Hindi
650 ## - SUBJECT ADDED ENTRY--TOPICAL TERM
Topical Term Criticism
942 ## - ADDED ENTRY ELEMENTS (KOHA)
Koha item type Books
Holdings
Full call number Accession Number Lost status Damaged status Price effective from Koha item type Not for loan Collection code Withdrawn status Home library Current library Shelving location Date acquired Cost, normal purchase price
H3091 T61S 65604     03/16/2026 Books   Hindi Books   RCL RCL General Stacks 12/26/2025 450.00

Find us on the map

Contact Us

RAMANUJAN COLLEGE UNIVERSITY OF DELHI, KALKAJI, NEW DELHI 110019
library@ramaanujan.du.ac.in
011-35002219
https://library.ramanujancollege.ac.in/
ramanujancollegelibrary
                                 
Customized & Maintained by Department of Library