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Dalit Sahitya Aur Manavadhikar /Ajmer Singh Kajal

By: Material type: TextTextPublication details: New Delhi: Nayee Kitab Prakashan, 2025.Description: 182p. ; 22cmISBN:
  • 9789348409898
Subject(s): DDC classification:
  • H308624 K18D
Summary: भारतीय दलित साहित्य ने भारतीय साहित्य का कई स्तरों पर विस्तार और लोकतंत्रीकरण किया है। संवेदना के स्तर पर उसने जिन प्रश्नों को उठाया है वे लोकतंत्र, गणतंत्र और देश को मजबूत करने और उसे राष्ट्र बनाने के प्रश्न हैं। वर्ण-धर्म और कास्ट हिन्दू ढाँचा लोकतंत्र और गणतंत्र विरोधी है जिसके भीतर जातीय वर्चस्व एक निरंतर प्रक्रिया है यही सत्ता, समृद्धि और सम्मान निर्धारित करती है। राजनीति जिस लोकतंत्र से चलती है, सामाजिक ढाँचा उसी लोकतंत्र का विरोधी है। जिस समाज या मुल्क में समता, स्वतंत्रता, मैत्री, प्रतिनिधित्व और करुणा के आधार जातीय वर्चस्व से निर्धारित होते हों, वह समाज या मुल्क अपने साथी नागरिकों के प्रति भावनात्मक स्तर पर जुड़ने को बजाय तनाव या अंतर्विरोधों से भरा रहता है। दलित साहित्य भारतीय समाज के इसी तनाव और अंतर्विरोध को गंभीरता से चित्रित करते हुए शोषण मुक्ति, मनुष्य मुक्ति, बंधुता-बौद्धिकता और नागरिक पहचान पर बल देते हुए सवैधानिक ढाँचे के भीतर सामाजिक-सांस्कृतिक भेदभाव से लड़ने वाले नये मनुष्य की तलाश करता है। यानी दलित साहित्य का संघर्ष मनुष्य हितेषी और मानवाधिकारों का पक्षधर है। यह पुस्तक भारतीय दलित साहित्य के परिप्रेक्ष्य में मानवाधिकार जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न को कविता, कहानी, उपन्यास, आत्मकथा जैसी विधाओं की आलोचना के जरिए उठाकर सामाजिकों में मानवीय गरिमा भरने का आह्वान करती है। साहित्य पाठक को अन्याय और शोषण की खिलाफत में खड़ा करके, सामाजिक संबंधों में मौजूद जडताओं को मानवीय बनाने हेतु फेलो सिटिज़न के प्रति संवेदना की निर्मिती करता है। एफ्रो-अमेरिकी साहित्य और हिंदी दलित साहित्य में उभरे प्रतिरोध को भी यहाँ विवेचित किया गया है। अतः यह पुस्तक साहित्य की विभिन्न विधाओं में मानवाधिकारों की पहचान, विवेचना और मूल्य निर्धारण करने का गंभीर प्रयास है।
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Books Books RCL Hindi Books H308624 K18D (Browse shelf(Opens below)) Available 65614
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भारतीय दलित साहित्य ने भारतीय साहित्य का कई स्तरों पर विस्तार और लोकतंत्रीकरण किया है। संवेदना के स्तर पर उसने जिन प्रश्नों को उठाया है वे लोकतंत्र, गणतंत्र और देश को मजबूत करने और उसे राष्ट्र बनाने के प्रश्न हैं। वर्ण-धर्म और कास्ट हिन्दू ढाँचा लोकतंत्र और गणतंत्र विरोधी है जिसके भीतर जातीय वर्चस्व एक निरंतर प्रक्रिया है यही सत्ता, समृद्धि और सम्मान निर्धारित करती है। राजनीति जिस लोकतंत्र से चलती है, सामाजिक ढाँचा उसी लोकतंत्र का विरोधी है। जिस समाज या मुल्क में समता, स्वतंत्रता, मैत्री, प्रतिनिधित्व और करुणा के आधार जातीय वर्चस्व से निर्धारित होते हों, वह समाज या मुल्क अपने साथी नागरिकों के प्रति भावनात्मक स्तर पर जुड़ने को बजाय तनाव या अंतर्विरोधों से भरा रहता है। दलित साहित्य भारतीय समाज के इसी तनाव और अंतर्विरोध को गंभीरता से चित्रित करते हुए शोषण मुक्ति, मनुष्य मुक्ति, बंधुता-बौद्धिकता और नागरिक पहचान पर बल देते हुए सवैधानिक ढाँचे के भीतर सामाजिक-सांस्कृतिक भेदभाव से लड़ने वाले नये मनुष्य की तलाश करता है। यानी दलित साहित्य का संघर्ष मनुष्य हितेषी और मानवाधिकारों का पक्षधर है। यह पुस्तक भारतीय दलित साहित्य के परिप्रेक्ष्य में मानवाधिकार जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न को कविता, कहानी, उपन्यास, आत्मकथा जैसी विधाओं की आलोचना के जरिए उठाकर सामाजिकों में मानवीय गरिमा भरने का आह्वान करती है। साहित्य पाठक को अन्याय और शोषण की खिलाफत में खड़ा करके, सामाजिक संबंधों में मौजूद जडताओं को मानवीय बनाने हेतु फेलो सिटिज़न के प्रति संवेदना की निर्मिती करता है। एफ्रो-अमेरिकी साहित्य और हिंदी दलित साहित्य में उभरे प्रतिरोध को भी यहाँ विवेचित किया गया है। अतः यह पुस्तक साहित्य की विभिन्न विधाओं में मानवाधिकारों की पहचान, विवेचना और मूल्य निर्धारण करने का गंभीर प्रयास है।

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